इन कविताओं के किसी भी रूप में उपयोग हेतु कुमार रवीन्द्र से पूर्व-अनुमति लेनी आवश्यक है -
क्या कहें
हम महानगरी में रहे
खानाबदोशों की तरह
घर बसाना नहीं मुमकिन
महानगरी में, सुनो
बिना नींवों के मकाँ हैं
उन्हीं में सपने बुनो
नेह की
आबोहवा की नहीं सोचो
नहीं है उसके लिए कोई जगह
सीढ़ियाँ-दर-सीढ़ियाँ
आकाश खोजो उम्र-भर
लौट-फिरकर पाओगे तुम
वही अंधे गुफाघर
काँच की मीनार में
रहता अँधेरा हर समय है
शाम होवे या सुबह
सभी चेहरे पत्थरों के
किसे हम अपना कहें
सोच पाते नहीं
कैसे अजनबी होकर रहें
हाट में जाकर
बिताएँ समय कैसे
और भटकें बेवज़ह
राजा के निर्णय सारे ही
बस वही...
अधर में लटके हैं
राजा के निर्णय सारे ही
कोरी बहसें हैं सभागार में
जिनका कोई अर्थ नहीं
कल रामराज की बातें थीं
वे भी तो सारी व्यर्थ रहीं
परजा की
आँखों में सागर
लहराते अब भी खारे ही
परबत से झरती राख रोज़
गंगाजल में विष घुला हुआ
रटता है 'मरा-मरा' केवल
आश्रम का सहमा-हुआ सुआ
करवाये
शांति-पाठ कितने
जीते आखिर हत्यारे ही
हर पाँच साल पर यज्ञ हुआ
पर आहुतियाँ निकलीं थोथी
देवालय के भीतर भी अब
रक्खी है कामसूत्र पोथी
हो गये लुटेरे
रामराज के हैं
साधो, रखवारे ही
सुनो राजन
सुनो राजन !
यह सभा फिर हुई अंधी
क्या करोगे
फिर शकुनि के हाथ में
आ गये पासे
ठगे जायेंगे प्रजाजन
फिर जुआ से
कहो राजन !
रोज़ होते नगर के उत्पात से
कैसे बचोगे
लाखघर की वही
पिछली योजनाएँ
सच हुईं हैं
महाभारत की कथाएँ
सुनो राजन !
प्रश्न-करते यक्ष से तुम
क्या कहोगे
फिर रहीं
रक्त में भीगी हवाएँ
हुईं निष्फल
सभी पुरखों की दुआएँ
कहो राजन !
किस तरह तुम नये युग को
जन्म दोगे
मन में, साधो, पाँच झरोखे
मन में, साधो
पाँच झरोखे
सबमें बैठे, सुनो. रामजी
मुजरा लें वे सकल सृष्टि का
देखें दृश्य अनूठे
किसिम-किसिम के नाद सुनें वे
कुछ सच्चे- कुछ झूठे
जो मन में
उपजें सुख-दुख हैं
सिरजें उनको, सुनो, रामजी
रचें बैठकर वहीँ रामजी
दरस-परस के खेले
चखें स्वाद सब खान-पान के
मानो, वही अकेले
इच्छाओं की
जो कपास है
उसकी, साधो, धुनो रामजी
कभी आरती की गंधें हों
कभी फूल की महकें
हिरदय के आकाश उड़ें पंछी
रह-रहकर चहकें
चले देह का
करघा हर पल
उस पर, साधो, बुनो रामजी
मन का दीया
मन का दीया
साधो, उसे जलाये रखना
वही काटता
रचा देह ने जो अँधियारा
साँसों की आँगन-ड्योढ़ी
रखता उजियारा
उसी जोत में
इच्छाओं को, सुनो, परखना
इसी दिये ने यादें सिरजीं
पान-फूल-सी
बाती इसकी
बालेपन की किसी भूल-सी
भोली
रसवंती चाहों के रस को चखना
यही दिया जलता
मंदिर-मस्जिद में, साधो
देवा एक नेह का
उसको ही अवराधो
सुख-दुख आवें
इसी जोत में उनको लखना