यह बेमानी था
चिट्ठी हाथ में लेते ही मैं जान गयी थी कि अनु भाभी की होगी | पीछे अपना नाम न लिखना उनकी आदत है | चिट्ठी एक तरह से लखनऊ आने का निमंत्रण थी | सुषमा की शादी तय हो गयी थी | लड़का लखनऊ का और मेरी ससुराल के मोहल्ले का था | भाभी के माता-पिता का इरादा लखनऊ आकर शादी करने का था | इसलिए मुझे बुलावे के अनेक लालच दिए थे कि ससुराल में सबसे मिल लोगी, अम्मा को देख जाओगी और मामा-मामियों, भैया-भाभियों सबसे तो मुलाकात होगी ही |
पर जनवरी में भला रवि को छुट्टी कहाँ मिलेगी | वह तो पढ़ाई का 'पीक पीरियड' होता है; फिर प्राइवेट कॉलेज की नौकरी | पर यह सब मैंने भाभी को नहीं लिखा था | 'कोशिश करूँगी', लिखकर चिट्ठी डाल दी थी | पर कोशिश भी मैंने नहीं की | तीन सौ रूपये भी निकलने कहाँ आसान हैं रेल-भाड़े के लिए |
फिर गर्मियों में हर साल की तरह छुट्टियाँ बिताने लखनऊ गयी थी | मैका-ससुराल दोनों ही वहीं हैं; इसलिए पूरी छुट्टियाँ वहीं बीतती हैं | सारे रिश्तेदार-कुनबा भी वहीँ | ऐसे में दो महीने का छुट्टियों का समय यों ही बीत जाता है |
एक दिन अनु भाभी के पास राजेन्द्र नगर मिलने गई थी | भानु भैया से शादी होने के बाद से मैंने अनु को कभी खुलकर हँसते नही देखा था | हाँ, अनु भाभी तो बाद में बनी थी | अनु के रूप में हम सब उसे पहले से ही जानते थे | बड़े मामा बिसवाँ की शुगर मिल में मैनेजर थे | वहीँ के एक क्लर्क की लड़की थी अनु | मुझसे कुछ छोटी होगी | हाँ, मामा की एक लड़की जरूर उसके बराबर है | छोटी-सी जगह; लखनऊ के मुकाबले में वहां कहीं कोई घूमने-घामने की ज़गह तो थी नहीं | बस मिल एरिया की साड़ी लडकियाँ मिलकर गप्पें हाँका करते थे | उसमें अनु सबसे ज्यादा जॉली थी | हर समय उधम मचाना, सभी की नकल उतारना और फिर खिलखिलाकर हँसना, यही उसका काम था | और हँसते हुए वह इतनी सुंदर लगती थी कि हम सब देखते रह जाते थे |
उसके कुछ महीनों के बाद ही मेरी शादी हो गई थी और मामा के यहाँ मेरा जाना न के बराबर हो गया था | मुझे पता ही नहीं चला कि कब अनु ने मेरी भाभी बनने की तैयारी कर ली थी | महेंद्र भैया वाली भाभी ने पत्र से सूचना दी थी कि भानु भैया से अनु की शादी हो रही है | बहुत ख़ुशी हुई थी उस समय मुझे |
छोटी मामी के न रहने के बाद मामा की छत्रछाया में बेहद लाड़ से पलने के कारण भानु भैया कुछ जिद्दी और चिड़चिड़े बन गये थे | अब अनु उन्हें ठीक कर लेगी, यह सोचकर मुझे संतोष हुआ था | पर मुझे क्या पता था कि अनु की अच्छाई भानु भैया को नहीं, बल्कि भानु भैया का रोग अनु को लग जायेगा | अक्सर गुमसुम रहना भानु भैया की आदत थी |
मेरा तो साल में एक बार ही लखनऊ जाना होता है, पर मोना, मेरी छोटी बहन सारे घरों की एक-एक खबर मुझे देती है | रवि उसकी चिट्ठी को खानदानी पिटारा कहते हैं |
* * *
गर्मी की दोपहरी खूब सोकर भी नहीं कटती | मैं और मोना लेटे हुए इधर-उधर की बातें कर रहे थे | महेंद्र भैया वाली भाभी यह पता लगता ही कि मैं लखनऊ आ गयी हूँ, मुझसे मिलने आईं थीं | सच, मैंने तो भाभी के रूप में उन्हें ही सबसे ज्यादा प्यार किया था | यों मेरे दोनों भाई व भानु भैया भी मुझसे बड़े हैं, पर शादी के बाद उनकी शादियाँ हुईं थीं, सो भाभियाँ मुझे हमेशा अपने से छोटी ही लगती रहती हैं | उन तीनों की शादी होने तक तो मैं दो बच्चों की माँ बन चुकी थी |
महेंद्र भैया वाली भाभी यों तो खूब काली हैं, पर भैया के काले-खुथरे चेहरे के सामने सुंदर ही लगतीं हैं | फिर स्वभाव भी कितना अच्छा है | मैं उनकी तारीफ के पुल बाँध ही रही थी कि मोना बोल पड़ी - 'दीदी, रहने भी दो बस | भाभी ऊपर से जितनी अच्छी लगती हैं, वैसी हैं नहीं |' मैं चौंककर उठ बैठी थी और मोना को देखने लगी थी | क्या मोना बड़ी हो गयी है, जीवन की जटिलताओं को समझने लायक हो गयी है या यह उसके बचपन की ही नासमझी है | उसका गोल-मटोल चेहरा देखकर मुझे हँसी आ गयी तो वह और जल-भुन गयी | और उसके बाद उसने जो कुछ मुझे बताया, उसका मतलब यही था कि अनु भाभी की हंसी चुराने वाली बड़ी भाभी ही हैं | अनु के सौन्दर्य के जिस ट्रंप कार्ड द्वारा भानु भैया जैसे एम. ए., एल एल. एम., पी एच.डी., पुराने जमींदारी वैभव और जोरदार वकालत वाले बाप के बेटे से शादी हुई थी, वही उसके खिलाफ पड़ गया था |
चिट्ठी हाथ में लेते ही मैं जान गयी थी कि अनु भाभी की होगी | पीछे अपना नाम न लिखना उनकी आदत है | चिट्ठी एक तरह से लखनऊ आने का निमंत्रण थी | सुषमा की शादी तय हो गयी थी | लड़का लखनऊ का और मेरी ससुराल के मोहल्ले का था | भाभी के माता-पिता का इरादा लखनऊ आकर शादी करने का था | इसलिए मुझे बुलावे के अनेक लालच दिए थे कि ससुराल में सबसे मिल लोगी, अम्मा को देख जाओगी और मामा-मामियों, भैया-भाभियों सबसे तो मुलाकात होगी ही |
पर जनवरी में भला रवि को छुट्टी कहाँ मिलेगी | वह तो पढ़ाई का 'पीक पीरियड' होता है; फिर प्राइवेट कॉलेज की नौकरी | पर यह सब मैंने भाभी को नहीं लिखा था | 'कोशिश करूँगी', लिखकर चिट्ठी डाल दी थी | पर कोशिश भी मैंने नहीं की | तीन सौ रूपये भी निकलने कहाँ आसान हैं रेल-भाड़े के लिए |
फिर गर्मियों में हर साल की तरह छुट्टियाँ बिताने लखनऊ गयी थी | मैका-ससुराल दोनों ही वहीं हैं; इसलिए पूरी छुट्टियाँ वहीं बीतती हैं | सारे रिश्तेदार-कुनबा भी वहीँ | ऐसे में दो महीने का छुट्टियों का समय यों ही बीत जाता है |
एक दिन अनु भाभी के पास राजेन्द्र नगर मिलने गई थी | भानु भैया से शादी होने के बाद से मैंने अनु को कभी खुलकर हँसते नही देखा था | हाँ, अनु भाभी तो बाद में बनी थी | अनु के रूप में हम सब उसे पहले से ही जानते थे | बड़े मामा बिसवाँ की शुगर मिल में मैनेजर थे | वहीँ के एक क्लर्क की लड़की थी अनु | मुझसे कुछ छोटी होगी | हाँ, मामा की एक लड़की जरूर उसके बराबर है | छोटी-सी जगह; लखनऊ के मुकाबले में वहां कहीं कोई घूमने-घामने की ज़गह तो थी नहीं | बस मिल एरिया की साड़ी लडकियाँ मिलकर गप्पें हाँका करते थे | उसमें अनु सबसे ज्यादा जॉली थी | हर समय उधम मचाना, सभी की नकल उतारना और फिर खिलखिलाकर हँसना, यही उसका काम था | और हँसते हुए वह इतनी सुंदर लगती थी कि हम सब देखते रह जाते थे |
उसके कुछ महीनों के बाद ही मेरी शादी हो गई थी और मामा के यहाँ मेरा जाना न के बराबर हो गया था | मुझे पता ही नहीं चला कि कब अनु ने मेरी भाभी बनने की तैयारी कर ली थी | महेंद्र भैया वाली भाभी ने पत्र से सूचना दी थी कि भानु भैया से अनु की शादी हो रही है | बहुत ख़ुशी हुई थी उस समय मुझे |
छोटी मामी के न रहने के बाद मामा की छत्रछाया में बेहद लाड़ से पलने के कारण भानु भैया कुछ जिद्दी और चिड़चिड़े बन गये थे | अब अनु उन्हें ठीक कर लेगी, यह सोचकर मुझे संतोष हुआ था | पर मुझे क्या पता था कि अनु की अच्छाई भानु भैया को नहीं, बल्कि भानु भैया का रोग अनु को लग जायेगा | अक्सर गुमसुम रहना भानु भैया की आदत थी |
मेरा तो साल में एक बार ही लखनऊ जाना होता है, पर मोना, मेरी छोटी बहन सारे घरों की एक-एक खबर मुझे देती है | रवि उसकी चिट्ठी को खानदानी पिटारा कहते हैं |
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गर्मी की दोपहरी खूब सोकर भी नहीं कटती | मैं और मोना लेटे हुए इधर-उधर की बातें कर रहे थे | महेंद्र भैया वाली भाभी यह पता लगता ही कि मैं लखनऊ आ गयी हूँ, मुझसे मिलने आईं थीं | सच, मैंने तो भाभी के रूप में उन्हें ही सबसे ज्यादा प्यार किया था | यों मेरे दोनों भाई व भानु भैया भी मुझसे बड़े हैं, पर शादी के बाद उनकी शादियाँ हुईं थीं, सो भाभियाँ मुझे हमेशा अपने से छोटी ही लगती रहती हैं | उन तीनों की शादी होने तक तो मैं दो बच्चों की माँ बन चुकी थी |
महेंद्र भैया वाली भाभी यों तो खूब काली हैं, पर भैया के काले-खुथरे चेहरे के सामने सुंदर ही लगतीं हैं | फिर स्वभाव भी कितना अच्छा है | मैं उनकी तारीफ के पुल बाँध ही रही थी कि मोना बोल पड़ी - 'दीदी, रहने भी दो बस | भाभी ऊपर से जितनी अच्छी लगती हैं, वैसी हैं नहीं |' मैं चौंककर उठ बैठी थी और मोना को देखने लगी थी | क्या मोना बड़ी हो गयी है, जीवन की जटिलताओं को समझने लायक हो गयी है या यह उसके बचपन की ही नासमझी है | उसका गोल-मटोल चेहरा देखकर मुझे हँसी आ गयी तो वह और जल-भुन गयी | और उसके बाद उसने जो कुछ मुझे बताया, उसका मतलब यही था कि अनु भाभी की हंसी चुराने वाली बड़ी भाभी ही हैं | अनु के सौन्दर्य के जिस ट्रंप कार्ड द्वारा भानु भैया जैसे एम. ए., एल एल. एम., पी एच.डी., पुराने जमींदारी वैभव और जोरदार वकालत वाले बाप के बेटे से शादी हुई थी, वही उसके खिलाफ पड़ गया था |
इस बार मिलने पर अनु भाभी की ख़ुशी पर मैं अपनी ख़ुशी ज़ाहिर कर ही रही थी कि भाभी ने अपनी ख़ुशी का राज़ खोल दिया | वह सुषमा की शादी से बहुत खुश थीं | सुषमा का पति अधिक पढ़ा-लिखा नहीं है, पर बहुत सुंदर व स्मार्ट है, अमीर घर का है | रंग तो साँवला है, पर लड़के तो साँवले ही अच्छे लगते हैं, यह भाभी की दलील थी | प्रताप सुषमा को बहुत प्यार करता है, भाभी ने विशेष बल देकर कहा था | मैं सोचने लगी कि क्या वे अपने मन में छिपी कोई दर्द की गाँठ खोलना चाह रहीं हैं | सुषमा और प्रताप को भाभी बुलवाने को तैयार थीं कि मैं मिल लूँ , देख लूँ, किन्तु मुझे और रवि को अभी अमीनाबाद जाना था और एक बजे तक घर भी पहुँच जाना था | सो मैं फिर आने का वायदा करके चल दी |
एक दिन मैं और मोना अमीनाबाद गये थे, तभी मोना ने बताया कि इधर पार्क के सामने ही प्रताप की रेडियो की दूकान है | मैंने सोचा सामने से निकलकर प्रताप को देख ही लिया जाये | रवि के साथ जाकर तो जरा भी इधर-उधर जरूरत के अलावा चलो कि रवि थम कर चौराहे पर खड़े हो जायेंगे और साफ कह देंगे - जाओ, तुम घूम आओ , मैं यहीं खड़ा हूँ | क्या मज़ेदार सिचुएशन क्रीएट कर देते हैं | कोई फिल्मवाला देख ले तो रवि को हीरो ही बना दे |
दूकान पर काफी भीड़ थी | मोना ने दूर से ही मुझे एक सजीले जवान को दिखाया था | लम्बे बाल- बड़ी-बड़ी घनी कलमें | हँस-हँसकर रिकार्ड्स बेचने में लगा था | ख़ुशी हुई थी देखकर प्रताप को और सुषमा को देखने की इच्छा जागी थी | छ: साल पहले की स्कर्ट-ब्लाउज पहनने वाली लडकी अब साड़ी में कैसी लगती होगी | शादी में, उसका भी खत्रानियों वाला गोरा रंग ही ट्रंप कार्ड बना होगा, वरना इतने अमीर घर के सजीले नौज़वान के साथ मामूली क्लर्क की लड़की की शादी कहाँ संभव थी कायस्थों में |
काफी खरीद-फ़रोख्त के बाद हम घर लौट आये थे | छुट्टियाँ खत्म होने को थीं | हम लोग लौटने की तैयारी में लग गये थे | फिर साल भर बाद मिलना होगा सबसे | सुषमा और प्रताप नैनीताल चले गये थे, इससे उनसे मिलने का प्रश्न ही नहीं था | अगले साल अगली खुशखबरी के साथ मिलने को कहकर मैंने अनु भाभी से अंतिम विदाई ली थी | पर मुझे क्या पता था कि अगली गर्मियाँ घर पहुँचने की ख़ुशी के साथ दुःख लेकर आएँगी |
अभी मुझे लखनऊ पहुँचे कुछ दिन ही हुए थे | अम्मा के पास ज्यादा रह न सकी थी, इसलिए मोना के समाचार पत्र के पन्ने अभी पूरी तरह खुले नहीं थे कि एक दिन अम्मा की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो गयी | मैं देखने गयी और वहीं रह गयी | रात में मोना मेरे पास ही चारपाई बिछाकर लेटी और गई रात तक हम दोनों नाते-रिश्तेदारों के बारे में बातें करते रहे |
सुबह ही मेरे देवर अनूप ने मुझसे प्रताप के बारे में पूछा था - "भाभी, प्रताप क्या तुम्हारा रिश्तेदार लगता है |" उसके स्वर में छिपे तिरस्कार से मैं अनभिज्ञ न थी, फिर भी मैंने पूछा - "क्या तुम उसे जानते हो ?" वह ठठाकर हँस पड़ा था और बोला था - "भला मोहल्ले के गुंडों को कौन न जानेगा |"
रवि नहाने गये थे, इसलिए अनूप कुछ खुलकर बातें कर रहा था | पर मैं अम्मा के पास जाने की जल्दी में थी | फिर मैंने उसे सीरियसली लिया भी नहीं था | अभी जवानी में कदम रख रहा है | डींगें हाँकना तो उसका काम है | परन्तु रात में मोना से पूछे बगैर मैं नं रह सकी | मैंने तो सिर्फ सुषमा का हाल पूछा था | पर मोना तो मानो भरी बैठी थी | बोली - " दीदी, बहुत सुन्दरता भी अच्छी नहीं होती | फिर प्रताप ने तो सुषमा का जीना दूभर कर दिया है |"
मोना सुषमा के करीब-करीब बराबर ही होगी, इसलिए मोना का उसमें रूचि रखना स्वाभाविक ही था | सुबह अनूप की बात और इस समय मोना का यह छोटा सा वाक्य मेरे मन में चुभ गया था | अब सारी बात विस्तार से जानने की मेरी इच्छा प्रबल हो उठी | मैंने मोना से पूछा - "आखिर बात क्या है ? पिछले साल तो अनु भाभी काफी खुश थीं |" मोना बोली - " दीदी, ये महेंद्र भैया वाली भाभी हैं न, बस सुन्दरता की दुश्मन हैं | पता नहीं प्रताप के मन में उन्होंने कैसे घुसा दिया है कि रज्जू भैया से सुषमा प्यार करती थी |" रज्जू भानु भैया का छोटा भाई है | मुझे याद आया कि बड़े मामा की ऋचा ने, जो अनु की सहेली भी थी, बताया था कि बड़ी भाभी ने भानु भैया के मन में रज्जू और अनु के लिए भी ऐसी ही बातें बिठाईं थीं | वह भी बड़ी भाभी से बहुत नाराज़ थीं |
रज्जू अनु भाभी का प्यारा इकलौता देवर | भला बड़ी भाभी को इस प्रकार से ज़हर घोलने में क्या मिलता है ? मन के अंदर किसी कोने में उठा था क्या महेंद्र भैया वाली भाभी का स्वयं बदसूरत होने का 'इनफीरियारिटी कॉम्प्लेक्स' ही तो नहीं उनसे यह सब कराता है ? यही सब सोचती मैं सो गयी थी | मोना पहले ही सो चुकी थी | सुबह जल्दी ही मैं रवि के घर लौट आई थी | गेट पर ही अनूप मिल गया था | मेरा हाथ पकड़कर बोला - "भाभी, प्रताप की वाइफ ने स्यूसाइड कर लिया है |" एक पल को मैं स्तब्ध रह गयी थी - यह मैं क्या सुन रही हूँ | अनूप ने पूछा – " भाभी, जाओगी तुम वहाँ ?" "नहीं", कहकर मैं अंदर चली गयी थी |
शाम को मैं अनु भाभी से मिलने गयी | सारा दिन रो-धोकर थकी-टूटी सी भाभी पलँग पर बैठी थीं | पास ही दोनों बड़ी बच्चियां सो रही थीं | भानु भैया छोटी को गोद में लिए खड़े थे | मेरे पहुँचने पर भी भाभी वैसी ही बैठी रहीं | भानु भैया रवि को साथ ले जाकर ड्राइंग रूम में बैठ गये |
यों सुबह से उडती-उडती खबरों से मुझे सब कुछ पता लग गया था | स्लीपिंग पिल्स खाकर सुषमा ने अपनी जान दी थी | विनोद, सुषमा के मौसेरे देवर ने अनूप को बताया था कि पहले भी सुषमा मर जाने की धमकी दे चुकी थी | शक के बीज प्रताप के दिल में इतने गहरे उतर चुके थे कि स्लीपिंग पिल्स उसकी ड्रेसिंग टेबिल की ड्रार में प्रताप ने उसे मर जाने के लिए उकसाने के लिए ही शायद रख छोड़ी थीं | दोनों में खूब-खूब लड़ाई होती थी | नौबत मारपीट तक पहुँच जाती थी |
पर उस रात तो कोई खास बात नहीं हुई थी | प्रताप कोई साड़ी लाया था, पर वह नहीं जो सुषमा पसंद करके आई थी | प्रताप ने पहनने को कहा, सुषमा तैयार नहीं हुई और लड़-झगड़ कर दोनों अलग-अलग कमरों में बंद हो गये थे | बाद में विनोद के समझाने पर सुषमा साड़ी पहनकर प्रताप के सामने जाकर खड़ी हो गयी थी | दोनों का गुस्सा उतर गया था | घूमने भी गये थे दोनों | परन्तु रात में विनोद ने खाने पर यह बता दिया था कि सुषमा ने उसके कहने पर साड़ी पहनी थी | प्रताप ने विनोद के इस सीधे-सादे रिमार्क को कुछ दूसरे ही ढंग से लिया था | और फिर रात में कहासुनी में बात यहाँ तक पहुँच गयी थी, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी |
काफी देर मेरे चुप रहने से वातावरण बेहद बोझिल होने लगा था | फिर भी कुछ तो बोलना ही था | मैंने भाभी के नज़दीक खिसककर कहा था - " भाभी, क्या हुआ था ? क्या कर लिया यह सुषमा ने ?" भाभी ने मेरी ओर नज़र उठाकर देखा | उनकी आँखों में एक भी आँसू नहीं था | दिन भर में शायद सब चुक गये थे | साधारण मौन में किस्मत और भगवान के सहारे छोड़ देने से जो शांति और सांत्वना मिलती है, वह भी नहीं थी | उनकी आँखों में आक्रोश था, घृणा थी और न जाने क्या-क्या था उन सबके प्रति जिनके कारण सुषमा ने आत्महत्या की थी | वे बस इतना बोलीं - " सुषमा ने वही किया, जो मुझे पाँच साल पहले कर लेना चाहिए था |" मैं सिहर उठी थी | मेरे पास कहने को कोई शब्द नहीं थे | मेरी दृष्टि सामने के बरामदे में रवि के साथ छोटी बच्ची को गोद में लिए खड़े भानु भैया पर से होती हुई पास ही सो रही दोनों बच्चियों पर गई और मैंने भाभी के चेहरे की ओर देखकर जान लिया था कि वे क्या कहना चाह रहीं थीं |
भाभी इस हाल में भी हँस पड़ी थीं - विषादमयी हँसी और बोली थीं - " सुमी बहन, मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि मैं तुम्हारे भानु भैया को मुक्त कर सकूँ, इन बच्चियों का मोह छोड़ सकूँ | तुम शांत मन से भोपाल जाना | अगले साल मैं फिर ऐसे ही मिलूँगी |"
इसके बाद कुछ कहने को शेष नहीं रहा था | रवि ने स्थिति समझकर चलने को कहा था | भानु भैया ने रिक्शा बुलाने को कहा, पर मैंने मना कर दिया | रस्ते भर मैं और रवि बिलकुल चुप थे | पर मेरा मन बराबर बोल रहा था | सोच रही थी - बड़ी भाभी को इन दोनॉ बहनों की ज़िंदगी बरबाद कर क्या मिला ? अचेतन मन का ज़वाब था- अहं की तुष्टि | पर चेतन मन बारबार यही कहता रहा - नहीं, महेंद्र भैया वाली भाभी ऐसी नहीं हो सकतीं | जो भी हो, पर यह ठोस सत्य था कि सुषमा अब इस दुनिया में नहीं है | उसने आत्महत्या की या उसकी हत्या हुई और उस हत्या के लिए जिम्मेदार कौन था, यह प्रश्न बेमानी था |