Tuesday, October 26, 2010

कुमार रवीन्द्र की रचनाएँ

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 नवगीत

अम्मा-बाबू पके पान-से     

अम्मा-बाबू पके पान-से   
जर्जर हैं
बूढ़े मकान-से 

करवा-तीजें रहे उपासी 
माँ है पगली गौरैया-सी 

दाने चुनती रोज़ धान से 
अम्मा-बाबू 
पके पान-से 

पिता पुरानी पोथी  पढ़ते 
हाँफ-हाँफ कर जीने चढ़ते 

चना-चबैना हैं थकान से 
अम्मा-बाबू 
पके पान-से

रिमझिम में सुनाये कोई कविता          

ज़रा सोचो 
घुप अँधेरा हो 
और उसमें पढ़ी जाये कोई कविता 

आरती की धुन बसी हो 
गूँज उसमें हो नमाज़ों की 
ज़िक्र हो शैतान बच्चों का 
बात कनखी के तकाज़ों की 

नाव में
बैठे हुए हम हों 
और रिमझिम में सुनाये कोई कविता

झील पर संतूर बजता हो 
याद में भीगी लटें भी हों 
जंगलों के बीच 
झरने या नदी की आहटें भी हों 

और ऐसे में 
अचानक 
उझक सीने में समाये कोई कविता 

कुछ  दीखे उस अँधेरे में 
और सब कुछ दे दिखाई भी 
कहीं पर लोबान महके 
कहीं वंशी दे सुनाई भी 

और भीतर 
जो नदी है 
उसी के तट पर सिराये कोई कविता 

काश हम पगडंडियाँ होते     

यों होते
काश !
हम पगडंडियाँ होते

इधर जंगल - उधर जंगल
बीच में हम साँस लेते
नदी जब होती अकेली
उसे भी हम साथ देते

कभी उसकी
देह छूते
कभी अपने पाँव धोते 

कोई परबतिया 
इधर से जब गुज़रती
घुंघरुओं की झनक 
भीतर तक उतरती 

हम
उसी झंकार को 
आदिम गुफाओं में सँजोते

और-भी पगडंडियों से 
उमग कर हम गले मिलते 
तितलियों के संग उड़ते 
कोंपलों के संग खिलते 

देखते हम 
कहाँ जाती है गिलहरी 
कहाँ बसते रात तोते   

नदी के उस पार   

नदी के उस पार
महानगरी और उसकी भीड़ अपरंपार

इधर अब भी
पेड़ हैं - पगडंडियाँ हैं
रौशनी है
उधर सड़कें - और सड़कें
और उन पर 
धुएँ की चादर तनी है 

राजपथ  पर 
एक सपना पत्थरों का ले रहा आकार

इस किनारे एक चिड़िया
खुले जल पर 
उड़ रही है 
उधर अनगिन वाहनों की भीड़ 
फिर अंधी गुफा में 
मुड़ रही है 

महल के पिछले सिरे पर
नये युग के बने स्वागत-द्वार   

फिर रहे इस ओर
नंगे पाँव बच्चे 
सीपियों की खोज करते 
'एयरगन' से लैस होकर 
उधर के बच्चे 
नदी-तट से गुज़रते

रहीं हैं 
सभ्यता के महावन से आहटें खूंखार 


ग़ज़लें         

ग़ज़ल -1

आयने में झुर्रियों के अक्स हैं, हम क्या करें 
उम्र-भर के दर्द दिल पर नक्श हैं, हम क्या करें 

क्या बताएँ- हम हुए किस्सा पुराने वक्त के 
शहर में तो अज़नबी सब शख्स हैं, हम क्या करें 

साल पहले मरे अपने दोस्त रामादीन थे 
रात पिछली मरे अल्लाबख्श हैं, हम क्या करें 

कहीं होते रोज़ जलसे- कहीं अंधी रात है 
और नंगे हो रहे अब रक्स हैं, हम क्या करें 

फेन साबुन का नदी पर- ताल पर भी झाग  है 
इन दिनों परियाँ लगातीं लक्स हैं, हम क्या करें 

ग़ज़ल -  

ज़िंदगी के मायने हम पूछते 
प्रश्न ऐसेलोग हैं कम पूछते 

काश, लड़की की, उधर जो है खड़ी 
आँख क्यों हो रही है नम, पूछते 

संत होते तो उन्हीं से आज हम 
क्यों जला कल रात आश्रम, पूछते 

गर हमें मिलता शहर लखनऊ तो 
गोमती क्यों हुई बेदम, पूछते 

साधु असली अगर होतेतभी तो 
क्यों अपावन हुआ संगम, पूछते                      

ग़ज़ल - 

धीरे-धीरे गीत पुराने हो गये 
यादों के वे पते-ठिकाने हो गये 

राख हुई पगडंडी की बातें करते 
जीने के बस यही बहाने हो गये 

आमदरफ्त धूप की होती है अब भी 
रिश्ते-नाते आने-जाने हो गये 

अंधे युग में रहते-रहते थका समय 
जाने कब दुख-दर्द सयाने हो गये 

दिव्य दृष्टि पाई थी जिनने पुरखों से 
नये वक्त में वे ही काने हो गये 

कोशिश थी देवता बनें- सबको सुख दें 
ख़ुद ही दुख के ताने-बाने हो गये  

ग़ज़ल - 

उनकी हमसे नज़र नहीं मिलती  
अब किसी की ख़बर नहीं मिलती 

रात पूनो की दिल में रहती थी 
खूब ढूँढा मगर नहीं मिलती    

पाँव-प्यादे जहाँ चले थे कल 
हमको अब वो डगर नहीं मिलती 

जिसको सुनते ही बात बनती थी 
बात वो बाअसर नहीं मिलती 

उसके आते ही फूल खिलते थे 
वो हवा अब इधर नहीं मिलती 

लोग उठते ही पाँव छूते थे 
अब कहीं वो सहर नहीं मिलती 

साथ रहती थी चाँदनी छत पर 
इन दिनों, भाई, घर नहीं मिलती 

शेर कहने को कहते हैं हम भी
पर कहीं भी बहर नहीं मिलती          


ग़ज़ल -  

जनम-ज़िंदगी हाट-लाट से परे रहे वे 
युग खोटा यह- इसमें भी हैं खरे रहे वे 

समझ  पाये दुर्योधन की राजसभा को 
भीतर अपने रामराज को धरे रहे वे 

संत नहीं थे, फिर भी धूप सभी को बाँटी
सहज नेह से अपने मन को भरे रहे वे 

नहीं सजावट बने किसी के नंदनवन के 
वे बरगद थे, पतझर में भी हरे रहे वे 

अपने जीवट से उनने यह स्वर्ग बनाया
नहीं किसी के भी,साधोआसरे रहे वे          











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