Friday, February 11, 2011

Kaling ka Sabera

कुमार रवीन्द्र की इस रचना के किसी भी प्रकार के उपयोग के लिए इ-मेल द्वारा पूर्व अनुमति लें |   


कलिंग का सबेरा  




अर्द्धरात्रि 
स्तब्ध प्रहर  
निबिड़ निशीथ में
तम के आलिंगन में धरती यों सिमटी थी 
होकर भय-विह्वल ज्यों प्रिय प्रिय-अंक में |
अगणित निज नयनों से 
देख रहा  शून्य-पुरुष झाँक-झाँक
धरती के अलसाये अंगों को 
जिन पर अगणित अबोध 
सुषमाएँ सोती थीं 
कमलपत्र मध्य किसी सुरभिमत्त भौरें सम |
अनजाना था जो अन्य
था अति जघन्य
वीभत्स
रौद्र अनाचार |

          *

तम के साम्राज्य मध्य
तमसावृत शिविर-द्वार 
प्रहरी एक उद्यत था -
अपनी ही साँसों की आहट से डरता-सा  
सन्नाटे का अभेद्य प्रांगण था नाप रहा |
शिविर मध्य सज्जा थी
राजोचित
वीरोचित
सारे अस्त्र-शस्त्रों की -
गदा, खड्ग, धनुष-बाण 
शिरस्त्राण और कवच |
स्निग्ध दीप कान्तिमान 
करता था अर्चना |
दुग्ध-धवल
फेन-शुभ्र शैया पर सोता था
अगणित शूरवीरों का समर्थवान सेनानी -
परमवीर मौर्य 
चंडाशोक शूर महाप्राण |
अंगों पर
अगणित समरयज्ञों का तेज था
साँसों में बसती थी  
नित्य रक्त-आहुति की
प्रबल पराक्रम की
अनंत वीर-विक्रम की
अपार उत्तेजना -
प्राणों में अपराजित तेजवान चेतना |

मौर्यकुल-कुंजर ने
पिता-पितामह के
अनन्य शौर्य-सौरभ को
दिशि-दिशि विस्तीर्ण किया -
धरती के आनन को सतत विदीर्ण किया |
परमभट्टारक ने
जीतकर कलिंग राज्य  -
काँटे-सा खटकता था जो उसके प्राणों में -
मौर्य-साम्राज्य को बनाया था अपराजेय -
दिग्विजयी स्वप्न प्रबल
उसका साकार हुआ |
युद्ध में बिछे
अनंत अंग साक्षी थे
पौरुष के
प्रण के
बल और विक्रम के
प्रचंड स्वप्न-पूर्ति के |

           *

आकृति एक 
शिविर मध्य गोचर हुई सहसा -
दीप के प्रकाश की प्रवृद्ध हुई कांति स्वयं  |
मुखमंडल तेजयुक्त 
किंचित मलीन था -
मेघों के कानन मध्य सूर्य-बिम्ब हो जैसे |
करुणा का
ममता का
बुद्ध की समता 
सर्वदमन शांति का
सचराचर प्रेम का 
रुचिर मिला-जुला भाव 
नयनों से झाँक रहा -
दूरगामी सपनों की गहराई आँक  रहा |
केशहीन मुख पर खिले 
नयनों के युगल पद्म -
विस्तृत भ्रू-तले वे विशाल अक्ष निर्दोषी 
शिव-से सर्वतापहरण 
मंगलमय सृष्टिभरण -
करते अनन्य प्रीति-सौरभ का रस-वर्षण |

जाग उठा चंडाशोक
अपने ही सपनों की
प्रबल उत्तेजना से -
मत्तगज चेतना से
सहमा
कुछ झिझका 
ससंभ्रमित उठ बैठा 
निकट पड़े खड्ग पर सहज ही हाथ जा पहुँचा |
परमशांत मुद्रा ने बरजा नहीं उसको -
अनायास ही अशोक हतप्रभ-सा हो गया 
असह्य मुग्ध दृष्टि-तले |
अंग जड़ित-से उसके
तीव्र हुई श्वास-गति -
बोला भय-विह्वल फिर -
'कौन...कौन... हो तुमभिक्षु ?'

देख दिग्विजयी को
विचलित कंपित देहयुक्त
वाणी स्खलित-सी 
नि:सत्त्व और क्रियाहीन
आकृति के नयनों में करुणभाव गहराया -
माँ जैसे देखे अपराधी पुत्र ओर सहज
ममता और वेदना अपार से पूरित दृष्टि |
बोली वह आकृति
वाणी स्निग्ध सौहार्दभरी -
" वत्सप्रियदर्शी अशोक
मौर्यकुलभूषण !
मैं हूँ कोई अन्य नहीं
तेरा ही तदनुरूप -
अंतर की दृष्टि धवल
प्राणों का महातेज
वीतराग अवचेतन 
नित्य जो विरागभरी चेतना जगाता है -
प्राणों को भरता है अमृत की ऊर्जा से |

तुमने पर सुने नहीं
मेरे शुद्ध-बुद्ध वचन -
होकर प्रबुद्ध रहे 
अंधे आत्म-केन्द्रित ही |    
तुमने मुझे दुत्कारा 
फिर-फिर तिरस्कार किया
पर मैं चला आया यहाँ 
युद्धभूमि में भी |
आत्मा भी प्राणों से
छाया भी तन से क्या 
पृथक कभी होती है |
आओचलो युद्धभूमि
देखो पराक्रम निज -
अपने ही नयनों से
अपना ही बल-विक्रम |” 
            
   
सुनता था मंत्रमुग्ध :
दृष्टिबद्ध सम्मोहित वशीभूत 
चंडाशोक अनुगामी हो गया उसका |
आकृति  थी आगे 
पीछे चलता अशोक था
जैसे हो माया अनुवर्ती ब्रह्म की 
अथवा छाया पुरुष के पीछे हो चलती ज्यों |

                 *

युद्धभूमि -
अर्द्धचन्द्र निकला था
सहसा मेघराशि छोड़
कुटिल कटार-सा 
अथवा तीखे कटाक्ष-सा
पैना धारदार और रक्तभरा ताम्रवर्ण |
सहमा था वह भी देख 
धरती की नरलीला -
हिंसा की ज्वाला की
नरमुंडी माला की
प्रतिहिंसा हाला की
संहारक व्याला की |

हो गया सहसा ही 
संहारी दृश्य व्यक्त -
अगणित कबन्धों से धरती थी पटी पड़ी -
रुंड मुंडहीन, अंग छिन्न-भिन्न थे अनंग 
भेद था समाप्त वहाँ नर और वाहन का 
चारों ओर महाकार काल का प्रसार था |         
रुधिराकुल सरिता में 
होते थे प्रवहमान
अगणित अंग-प्रत्यंग -
रुण्ड-छिन्न मुण्ड थे प्रचण्ड |

क्षीण शशि-ज्योत्स्ना में
लगती थी और अधिक भयकारी 
रक्तवर्ण तमसा विभावरी -
दृश्य था भयंकर 
नरहिंसा का नारकीय 
देखकर जिसे यम भी हो जाये भय-विह्वल |

आकृति थी वीतराग 
हुई किन्तु विकल करुण |
मुख पर फिर 
वेदना अकलुष अवतरित हुई |
कंठ-रुद्ध, करुणा-आर्द्र 
बोली फिर रुक-रुककर -
मानो कोई पीड़ा की शिरा हो टेरती -
"तूने क्या किया, वत्स !
बोलयह क्यों किया ?"
शनैशनै: शांत हो
बोली फिर आकृति यों -
देखदेख ! चहुँ दिशि में  विस्तृत 
साम्राज्य निज -
हिंसा यह महाकार
मृतकों का राज्यतंत्र |
इनका तू शासक है
इनका तू स्वामी है -
भूलुंठित लोथों का तेरा  साम्राज्य सफल |

कितने ही सुहागों का
स्वर्णिम संसार बुझा -
बच्चों के सपनों की करके निर्मम हत्या -
खंडित भविष्य कर 
हिंसा से महाकार
तूने यह प्राप्त किया राज्य निष्प्राणों  का - 
तेरी है कीर्ति अचल !
साक्षी यह धरती है
साक्षी यह चन्द्र ज्योति 
साक्षी नभगंगा में विस्तृत तारे हैं 
तेरे महत गौरव के
नारकीय रौरव के
हिंसा के भैरव के
रक्तपात के रव के -
जिनका तू सृष्टा है शाश्वत इतिहास-अमर |

खोलकर गवाक्ष देख अपने क्षुद्र अंतर का -
तूने कितने भविष्य
कितने ही मनहर स्वप्न 
कितनी महत इच्छाएँ 
सुंदर कितनी अनाम स्वर्णिम मृदु कल्पनाएँ 
परियों के पंख-सी कोमल मधु भावनाएँ
अपने अहं-तुष्टि हेतु 
अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु
नितप्रति बलिदान किये -
प्राण की पिपासा को रक्त-समाधान दिये -
डूबे आकंठ नित्य रक्त-सुरभि मदिरा में
मदोन्मत्त होकर 
रुधिर-धार में नहाये तुम |

देख सृष्टि अपनी यह
रुधिर-वृष्टि अपनी यह
प्राणों के हन्ता का गौरव फिर प्राप्त कर -
और देख लाशों से पटी
यह धरती माँ -
कुक्षि-पुत्रहीन 
सूनी सीमन्तिनी 
रक्त-स्नात वक्ष लिए 
तुझसे क्या कहती है
प्राणों के हाहाकार मध्य बहती है -
"और नहीं ...और नहीं
हो गयी असह्य अब 
पीड़ा अनुदार विकल -
धृष्ट मानव-विकार हिंस्र -
पापों का बोझ अब सहन नहीं होता है |
तूने भी वही किया
वही रक्त-वृष्टि सतत 
मृत्यु की अनंत सृष्टि |
अंत नहीं-अंत नहीं 
लिप्सा का अंत नहीं |
अगणित साम्राज्यों को
मैंने इन वक्षों पर
पाल है, पोसा है और फिर नष्ट किया 
उनकी महत इच्छा से, लिप्सा से ऊबकर |
कितने सम्राटों ने तुझसे भी पूर्व, मूर्ख 
मेरी इस काया को क्षत-विक्षत करके 
फिर प्रेयसी बनाया था -
बने स्वयं भोक्ता, हाय 
अपनी ही जननी के -
अनाचार महाकार !
करती मैं हाहाकार !"   

काँप गया चंडाशोक 
धरती का हाहाकार अंतर में समा गया |
विद्युत की धारा-सी  रग-रग में व्याप गयी 
प्राणों में फैल गयी तप्त एक ज्वाला-सी
विष से बुझे बाण सदृश 
एक-एक शब्द लगा सीधे मर्मस्थल में |
मर्माहत 
शुष्क कंठ 
घुटते-से घ्राण थे 
रग-रग में चिंगारी 
रौरव की फूट रही 
पश्चाताप-अग्नि में सुलगते-से प्राण थे |
माँगते थे त्राण 'त्राहि-त्राहि' की पुकार में |
और तभी उमड़ी थी 
सहसा नभ-गंगा-सी -
मन के सगरपुत्रों के पापों के शमन हेतु -
एक दिव्य वाणी-सी
अंतर की गुहा मध्य -
" धीरज मत खोओ, वत्स !
जीवन है सतत गतिमान, अवरुद्ध नहीं |
देखोहै जाग रहा गौरवमय नव विहान -
आत्मा की झंझा से शाश्वत अवकाश लो |
गौरव का
पुण्य का
प्रताप का अनश्वर निज
करो नित्य भान, पुत्र  !"

जगा जैसे अशोक
स्वप्न से प्रचंड विकल -
आकृति अचानक ही हो गयी अदृश्य कहीं 
मानो अशोक में पाकर निज सहज प्राण |
अंतर में
शीतलता शनै: शनै: व्याप गयी
साँसों में, प्राणों में वैभव-सा जाग उठा |

                 *

स्वप्नशील था अशोक
बनकर अनुराग विमल | 
आँखों से अश्रुधार सतत प्रवाहित थी
कंठ अवरुद्ध
पर अंतर था बोल रहा
जन-मन पवित्रकरी उस रसधारा में |
देवानांप्रिय महान 
प्रियदर्शी शुद्ध हृदय 
मुग्ध दृष्टि-सृष्टि विशद -
नयनों में नये क्षितिज 
आगत भविष्य के उदयमान होते थे |
धर्म-प्रति आस्था का      
अनंत साम्राज्य था -
प्रीति का
जीवन का
शास्ता के वचनों का
बुद्ध के प्राणों का
सुरभित था अनघ स्वप्न
साँसों में गूँज रहा
अभयदान महामंत्र -
'बुद्धं शरणं गच्छामि 
संघं शरणं गच्छामि
धम्मं शरणं गच्छामि' |         
       

   
    
      
( संकलन - 'लौटा दो पगडंडियाँ' -१९९० से )  

3 comments:

  1. साँसों में गूँज रहा
    अभयदान महामंत्र -
    'बुद्धं शरणं गच्छामि
    संघं शरणं गच्छामि
    धम्मं शरणं गच्छामि' |

    how true

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  2. Thanks / yes many-many thanks ! Are you on facebook ?

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  3. no uncle i am not on face book or any social networking site

    i enjoy reading your poems
    thank you

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