Wednesday, March 9, 2011

Kuchh Aur Navgeet

इन कविताओं के किसी भी रूप में उपयोग हेतु कुमार रवीन्द्र से पूर्व-अनुमति लेनी आवश्यक है - 





क्या कहें


क्या कहें 
हम महानगरी में रहे 
        खानाबदोशों की तरह  

घर बसाना नहीं मुमकिन
महानगरी में, सुनो  
बिना नींवों के मकाँ हैं 
उन्हीं में सपने बुनो 

नेह की
आबोहवा की नहीं सोचो 
     नहीं है उसके लिए कोई जगह 

सीढ़ियाँ-दर-सीढ़ियाँ
आकाश खोजो उम्र-भर 
लौट-फिरकर पाओगे तुम 
वही अंधे गुफाघर

काँच की मीनार में
रहता अँधेरा हर समय है
                     शाम होवे या सुबह   

सभी चेहरे पत्थरों के
किसे हम अपना कहें
सोच पाते नहीं
कैसे अजनबी होकर रहें 

हाट में जाकर 
बिताएँ समय कैसे
                     और भटकें बेवज़ह 








राजा के निर्णय सारे ही 




बस वही...
अधर में लटके हैं 
राजा के निर्णय सारे ही

कोरी बहसें हैं सभागार में
जिनका कोई अर्थ नहीं 
कल रामराज की बातें थीं 
वे भी तो सारी व्यर्थ रहीं 

परजा की
आँखों में सागर
लहराते अब भी खारे ही   

परबत से झरती राख रोज़ 
गंगाजल में विष घुला हुआ 
रटता है 'मरा-मरा' केवल 
आश्रम का सहमा-हुआ सुआ

करवाये 
शांति-पाठ कितने 
जीते आखिर हत्यारे ही

हर पाँच साल पर यज्ञ हुआ
पर आहुतियाँ निकलीं थोथी 
देवालय के भीतर भी अब
रक्खी है कामसूत्र पोथी 

हो गये लुटेरे 
रामराज के हैं
साधो, रखवारे ही





सुनो राजन 




सुनो राजन !
यह सभा फिर हुई अंधी 
                        क्या करोगे 

फिर शकुनि के हाथ में
गये पासे
ठगे जायेंगे प्रजाजन 
फिर जुआ से

कहो राजन !
रोज़ होते नगर के उत्पात से 
                            कैसे बचोगे 

लाखघर की वही
पिछली योजनाएँ
सच हुईं हैं
महाभारत की कथाएँ 

सुनो राजन !
प्रश्न-करते यक्ष से तुम 
                            क्या कहोगे 

फिर रहीं
रक्त में भीगी हवाएँ
हुईं निष्फल 
सभी पुरखों की दुआएँ  

कहो राजन !
किस तरह तुम नये युग को 
                            जन्म दोगे 






मन में, साधो, पाँच झरोखे 


मन में, साधो
पाँच झरोखे
सबमें बैठे, सुनो. रामजी 

मुजरा लें वे सकल सृष्टि का
देखें दृश्य अनूठे 
किसिम-किसिम के नाद सुनें  वे
कुछ सच्चे- कुछ झूठे 

जो मन में
उपजें सुख-दुख हैं
सिरजें  उनको, सुनो, रामजी 

रचें बैठकर वहीँ रामजी
दरस-परस के खेले 
चखें स्वाद सब खान-पान के
मानो, वही अकेले

इच्छाओं की
जो कपास है
उसकी, साधो, धुनो रामजी

कभी आरती की गंधें हों 
कभी फूल की महकें 
हिरदय के आकाश उड़ें पंछी 
रह-रहकर चहकें 

चले देह का
करघा हर पल 
उस पर, साधो, बुनो रामजी






मन का दीया 



मन का दीया
साधो, उसे जलाये रखना 

वही काटता 
रचा देह ने जो अँधियारा   
साँसों की आँगन-ड्योढ़ी 
रखता उजियारा 

उसी जोत में
इच्छाओं को, सुनो, परखना 

इसी दिये ने यादें सिरजीं
पान-फूल-सी 
बाती इसकी 
बालेपन की किसी भूल-सी

भोली
रसवंती चाहों के रस को चखना 

यही दिया जलता 
मंदिर-मस्जिद में, साधो
देवा एक नेह का
उसको ही अवराधो

सुख-दुख आवें 
इसी जोत में उनको लखना                  
         

      



6 comments:

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  2. आदरणीय कुमार रवीन्द्र जी
    सादर प्रणाम !

    अंतर्जाल पर आपका ठिकाना पा'कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । आपके नवगीत जहां भी ( पचासों पत्रिकाओं में ) पढ़े , एक एक को दो-चार बार अवश्य पढ़ा । मैं आपका भक्त हूं ।

    मधुकर गौड़ जी से मोबाइल वार्तालाप के दौरान कई बार आपका नाम लिया है मैंने …

    यहां मैं आपको प्रणाम कहने के लिए ही ठहरा हूं अभी , आपकी रचनाओं पर कुछ कहने की मेरी सामर्थ्य कहां ?

    हां , तसल्ली से आपकी रचनाओं को पढ़ने से प्राप्त आनन्द की सूचना अवश्य देने पुनः आऊंगा
    हार्दिक शुभकामनाएं !


    समय मिले…
    और मेरे ब्लॉग पर आप पदार्पण कर पाएं ,
    कुछ कह पाएं तो मेरा परम सौभाग्य होगा ।
    यह है लिंक
    http://shabdswarrang.blogspot.com


    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  3. प्रिय भाई,
    आपका ब्लॉग 'शस्वरं' देखा| दो दिन पहले ही लंबे प्रवास के बाद दिल्ली से लौटा हूँ| सुख मिला आपसे, आपकी रागात्मकता से, आपके व्यक्ति एवं कृतिकार से मिलकर| जन्नतनशीं मोहतरिम निसार भाई की रचनाओं से, उनके स्नेहिल व्यक्तित्त्व को प्रस्तुत कर आपने हम सभी रचनाधर्मियों पर उपकार किया है| आभारी हूँ | रचना दीक्षित की कविताएँ भी पढ़ीं| मुझ पर आपकी टिप्पणी - भाई, हम सब समधर्मी हैं, अस्तु, समान हैं| उसी रूप में रहने दें| अपना स्वर बनाये रखें|
    आपका
    कुमार रवीन्द्र

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  4. नमस्ते रविन्द्र सर जी

    अंतरजाल पर आपके नवगीतों को बहुत समय से पढ़ रही हूँ , यहाँ ब्लॉग पर मिलकर अत्यंत प्रसन्नता हुई है। आपके नवगीतों की कायल हूँ , आपके नवगीत पढ़ती रहती हूँ , यहीं से प्रेरणा मिली है नवगीत लिखने की … आपसे कभी भेंट नहीं हो सकी। आपकी रचनाएं अनुभूति में पढ़ती रहती हूँ , प्रयास कर रही हूँ कि अच्छी नवगीतकार बन सकूँ।
    सादर
    शशि पुरवार


    http://sapne-shashi.blogspot.com

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  5. आदरणीय रवीन्द्र जी आपकी रचनाएँ कई पीढ़ियों तक पढ़ी और सराही जाती रहेंगी। यह विरासत उनका मार्गदर्शन करती रहेगी। मैंने आपके नवगीतों से बहुत कुछ सीखा है, लेकिन लेखन में उतारना अलग बात है यह इतना आसान नहीं है। आज शशि पुरवार ने आपके ब्लॉग का पता दिया। एक नया अध्याय पठन का शुरू हो जाएगा। ईश्वर आपको स्वस्थ दीर्घायु जीवन प्रदान करें।

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