नवगीत बनाम पारंपरिक गीत
अक्सर एक प्रश्न उठाया जाता है कि नये भावबोध के गीत के लिए 'नवगीत' संज्ञा का उपयोग क्यों ज़रूरी है और यह भी कि किन दृष्टियों से नवगीत गीत यानी पारंपरिक गीत से अलग है | किसी भी कविता के काव्य-तत्त्व की पड़ताल दो पहलुओं से की जाती है : एक है उसका कथ्य या वर्ण्य-विषय, जिसमें उसकी अंतर्वस्तु भी शामिल है और दूसरा है उसकी कहन या अभिव्यक्ति का ढंग | अच्छा हो, यदि हम इन दोनों ही दृष्टियों से 'नवगीत बनाम पारंपरिक गीत' के प्रश्न पर विचार करें, गीत के इन दोनों स्वरूपों की बारीकी से पड़ताल करें |
नवगीत प्रयोगधर्मी गीत है, नवता के आग्रह से उपजा है | इसलिए उसके कथ्य एवं कहन दोनों में नवता का होना लाज़िमी है | नवगीत की यह मज़बूरी उसे पारंपरिक गीत से अलगाती ही नहीं, उसे कुछ हद तक उसके विरोध में भी खड़ा कर देती है | पारंपरिक गीत अधिकांशतः कवि-सम्मेलन की वाचिक-गायकी परंपरा से जुड़ा रहा है, अब भी जुड़ा हुआ है | कवि सम्मेलनी अनिवार्यताएँ, यथा गेयता, दोहराव, श्रोताश्रित पाठ-भंगिमाएँ, उसे संप्रेषणीयता के नाम पर सरलातिसरल बनाये रखने का मोह आदि ऐसे गीत की सीमाएँ निश्चित करतीं है | गहन-गंभीर, पठन-पाठन और भावन के लिए जिस अर्थ- गांभीर्य एवं सहज भावात्मक सोच की कविता में दरकार होती है, उनका उनमें लगभग अभाव होता है | गलित भावोच्छ्वास वाले ये गीत या तो व्यक्ति-निष्ठा या विशुद्ध बाज़ारी लेन-देन के समीकरण से उपजते हैं | पारंपरिक गीत के कुछ फार्मूले होते हैं; उसकी रचना और पाठ के कुछ पूर्व-निश्चित लटके-झटके होते हैं, जिनसे उनकी संरचना एवं उनके अर्थ निर्धारित होते हैं | यह साहित्येतर दृष्टि उन्हें छिछला और सतही बनाता है | ऐसे अधिसंख्य गीत शुद्ध तात्कालिकता से संदर्भित होते हैं, जो देश-काल की सीमा से परे के शाश्वत संकेतों को या तो छूते ही नहीं या उन्हें गड्ड-मड्ड कर ऐसा उलझा देते हैं कि उनकी पहचान खो जाती है | क्योंकि 'गीत' शब्द हर तरह की लचर अभिव्यक्ति के लिए, किसी भी टूटी-फूटी विगलित, कोरी तुकाश्रित तथाकथित कविता के लिए प्रयुक्त हो सकता है, होता भी है, अर्थ-गांभीर्य से युक्त गीत-रचना के लिए, जो प्रयोगधर्मी होने के नाते कथ्य के नये धरातलों की खोजी होती है और इसी कारण शिल्प की नई-नई भंगिमाएँ प्राप्त करने को समुत्सुक और विवश होती है, एक नये संबोधन की आवश्यकता महसूस की गयी | प्रारंभ में 'नई कविता' की तर्ज़ पर किसी ने इसे 'नया गीत' कहा तो किसी ने 'नवगीत' | अंततः 'नवगीत' संज्ञा ही सर्वमान्य एवं प्रचारित हुई |
'नवगीत' की प्रयोगधर्मी अभिव्यक्ति का एक प्रमुख पहलू है उसके कथ्य का मनुष्य के अवचेतन से जुड़ाव | यह जुड़ाव हमारे जातीय बोध के मूल संस्कारों को 'नवगीत' में सक्रिय रखता है | मानुषी अवचेतन की धारा प्रवाह में झील या पोखर के जैसी बँधी हुई या जड़ीभूत नहीं होती; न ही सागर की तरह कभी एकदम शांत, अनुशासित एवं मेखलाबद्ध तो कभी उच्छल और चरम विद्रोही | वह धारा तो एक पर्वतीय नदी की भाँति ऊँचे-नीचे धरातलों के समानांतर पूर्वापर अनुभवों-अनुभूतियों को समेटती, उनसे आकार ग्रहण करती चलती है | उसमें अनामिल, एक-दूजे से नितांत अजनबी सन्दर्भों की एक-साथ उपस्थिति हो सकती है | ऊपर से यह धारा कभी उच्छाल, कभी सुप्त, कभी लुप्त लगती है, पर नीचे इसमें गंभीर एकात्मकता होती है |नवगीत इसी गहरे में बह रही एकात्म अवचेतन भाव-धारा का गीत है | इसीलिए उसके बिम्बों में कई उथल-पुथल, असंतुलन, अर्थाभास या असंगति जैसी आवृत्तियाँ होने लगती हैं | इसके विपरीत पारंपरिक गीत का मुखड़े से ही एक पूर्व-निश्चित ढाँचा होता है, जिसमें अर्थों को निश्चित एवं अपेक्षित शब्द-बिम्बों में रूपायित किया जाता है | उनका एक सायास प्रबन्धन होता है | इधर नवगीत में भावों को सहज बहने दिया जाता है | ये भाव आगे-पीछे बिना किसी पहचाने अथवा पूर्व-नियोजित आकृति के अपने को प्रस्फुटित या विस्फोटित करने को काफ़ी हद तक स्वतंत्र होते हैं | नवगीत का प्रारंभ कहीं से भी होकर उसका समापन कहीं भी हो सकता है | मुखड़ा नवगीत का निर्धारक तत्त्व नहीं होता | हाँ, उससे दिशा-निर्देश अवश्य होता है और वह दिशा-निर्देश भी राजमार्ग का नहीं, पगडंडी का होता है, जिसमें छोटी-मोटी भटकन की पूरी गुंजाइश होती है | नवगीत शुद्ध व्यक्तिगत या समष्टिगत भी नहीं होता | यह या वह की बात नवगीत पर लागू नहीं होती | व्यक्ति-अनुभूति एवं समष्टि-संवेदना, दोनों एक-साथ एक नवगीत में उपस्थित हो सकते हैं, अधिकांशतः होते भी हैं| व्यक्तिपरक और समष्टिपरक, कई बार बिल्कुल असंबद्ध चिंतन-अनुभूति बिम्बों का एक दूसरे पर आरोपण हो सकता है,एक-दूजे में प्रवाह हो सकता है | एक पारंपरिक गीत इस प्रकार की असंबद्धता को साध नहीं पाता है और इसीलिए उसे स्वीकार भी नहीं करता | कथ्य का यह बेडौलपन नवगीत को रास आता है, क्योंकि आज के जटिल जीवन-प्रसंगों में भी अनुभव-अनुभूतियों के धरातल पर इसी तरह की असंगति या बेडौलपन दिखाई देता है | कथ्य का यह खुरदुरापन नवगीत को पारंपरिक गीत से स्पष्टतः अलगाता है |
एक और महत्त्वपूर्ण बात है कि नवगीत अर्थ-संक्षेप में यकीन रखता है | इसीलिए वह अधिक सुगठित, अधिक गहरे और सांकेतिक होकर प्रस्तुत होता है | उसमें अर्थ-विपर्यय या बिखराव नहीं होता, जैसा पारंपरिक गीत में अक्सर होते पाया जाता है | नवगीत में अर्थ-बिम्ब अधिक सघन होकर प्रस्तुत होते हैं | सहज आमफहम बिम्बों के भी संकेतार्थ नवगीत को अतिरिक्त रूप से अर्थ-गहन बनाते हैं | नवगीत में अर्थों के शाब्दिक पहलू से अधिक शब्दों के ध्वन्यात्मक संकेतों, गूँजों-अनुगूँजों, पारस्परिक संघातों, उनमें निहित सारे सांस्कृतिक परिवेश के रूपांकन की अमित संभावनाएँ तलाशी जाती हैं | यह तलाश सायास या साग्रह नहीं होती | यह शब्दों में अर्थों के अगोपन होने की प्रक्रिया का ही अंग होती है | नवगीत में अनुपस्थित अर्थ, जो अच्छी कविता का मर्म होता है और जो कविता के अर्थ को गहनता प्रदान करता है, अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत हो पाता है, क्योंकि नवगीत शब्दों के बीच में छिपे ध्वन्यात्मक आदिम इंगितों को बड़ी सहजता से भाषित कर लेता है | पारंपरिक गीत इन इंगितों को या तो पहचान नहीं पाता या उन्हें भाषित कर पाने में अक्षम सिद्ध होता है, क्योंकि वह शब्दों के रूढ़ और अति-साधारण अर्थों तक ही अपने को सीमित रखने को विवश होता है | पारंपरिक गीत इसीलिए परंपरा के विकास, उसके भविष्योन्मुखी होने की प्रक्रिया में कोई विशेष योगदान नहीं दे पाता | इसके बरअक्स नवगीत अपनी प्रयोगधर्मी प्रकृति के कारण जातीय एवं भाषिक परंपरा को नये आयाम, नई दिशा एवं भंगिमाएँ दे पाने में समर्थ होता है | नयेपन का सम्यक-संतुलित समन्वयन नवगीत की विशिष्ट उपलब्धि रही है | प्रयोगधर्मिता का आग्रह उसे नये अर्थों, नई संभावनाओं का खोजी बनाता है | इन्हीं प्रयोग-आग्रही अर्थ-प्रस्तुतियों से नवगीत के माध्यम से परंपरा का नवीकरण होता रहा है |
कहन के धरातल पर पिछले पचास वर्षों में नवगीत में नये प्रयोगों की एक समृद्ध श्रृंखला रही है | लोकधर्मी नवगीत की लोकगीतात्मक कहन से लेकर शुद्ध नागरी और अत्याधुनिक बिम्बों में कहन तक की तमाम शैलियाँ नवगीत में सहज उपलब्ध रही हैं | हिंदी के छंदों के प्रयोग नये ढंग से यानी उनके टुकड़ों का आंगिक प्रयोग तो सभी
नवगीतकारों ने किया है, उर्दू की स्वीकृत बहरों का प्रयोग भी नवगीत में प्रचुर मात्रा में हुआ है | नवगीत की शब्द-संपदा वैसे तो मूल रूप में संस्कृत से ही प्राप्त हुई है, किंतु इधर के नवगीतों में उर्दू के आमफहम शब्दों के प्रयोग का चलन बढ़ा है | उससे नवगीत की शाब्दिक संरचना अधिक सहज और आम बोलचाल की भाषा के अधिक नज़दीक आई है | आम ज़िंदगी में प्रयोग होने वाले मुहावरों-कहावतों एवं वाक्यांशों आदि का हिंदी नवगीत में अत्यंत सफल प्रयोग हुआ है | अलंकारिक एवं शुद्ध सामासिक भाषा से आज के नवगीत को परहेज़ है | यही वे सशक्त आधार-बिंदु हैं, जिनसे नवगीत अपनी कहन को पारंपरिक गीत की कहन से अलगाता है | नवगीत का और उसके बिम्बों का आकार पारंपरिक गीतों के दीर्घाकृति एवं पूर्ण-व्याख्यायित बिम्बों के मुक़ाबले अधिक छोटा, अधिक संक्षिप्त होता है, अस्तु, अधिक पैना भी है | इससे न तो अर्थ-विस्फार का खतरा रहता है और न ही पारंपरिक कहन जैसी लंबी-लंबी उक्तियों की उबाऊ विवशता | गेयता नवगीत में भी है, पर वह गलेबाज़ी या सस्ती फ़िल्मी गायकी जैसी नहीं है | नवगीत में गेयता अच्छी कविता के सही पाठ का ही हिस्सा है |
नवगीत की संभावनाएं अमित हैं | वह अपने चुटीले व्यंजनार्थक पैनेपन से समकालीन सभी संगत-असंगत स्थितियों का आकलन करने में सक्षम है | साथ ही अपनी कालजयी चिंतन-पहुँच के कारण वह पिछले पूरे काव्य-परिप्रेक्ष्य को पुनर्परिभाषित करने और भविष्य की दिशा-इंगितों को निर्देशित करने में भी उतना ही समर्थ है | आग्रह-मुक्त होने से उसकी दृष्टि प्रखर और स्पष्ट है | आज का नवगीत कविता की सहज अभिव्यक्ति का एक अत्यंत प्रामाणिक दस्तावेज़ है, इसमें कोई संदेह नहीं है |
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