Friday, December 24, 2010

Navvarsh ka Abhinandan

इस ब्लॉग पर प्रकाशित रचनाओं के प्रयोग हेतु रचनाकार कुमार रवीन्द्र से इ-मेल द्वारा संपर्क करें  


नये साल के गीत

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यह भी 
एक तरीका  है
नववर्ष मनाने का

व्यूह धुंध का -
उसमें पैठो
खोजो सूरज को
छिपा आँख में बच्चे की
देखो उस अचरज को

एक पुण्य
यह करो 
नदी में दीप सिराने का

ओस पड़ी जो पत्तों पर 
उससे आँखें आँजो 
यादें जो मिठबोली
उनको साँसों में साजो  

सीखो गुर 
कबिरा से 
मन के ताने-बाने का

मीनारों के जंगल में भी 
धूप भरो थोड़ी 
उस पोथी को भी बाँचो
जो बाबा ने छोड़ी 

बाँटो सबमें 
जो प्रसाद है 
दाख-मखाने का        






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अभी होने दो
समय को 
गीत कुछ दिन और

वक्त के बूढ़े कैलेंडर को 
हटा दो 
नया टाँगों
वर्ष की पहली सुबह से 
बाँसुरी की धुनें माँगो

सुनो निश्चित 
आम्रवन में 
आएगा फिर बौर 

बर्फ की घटनाएँ 
थोड़ी देर की हैं 
धूप होंगी 
खुशबुओं के टापुओं पर 
टिकेगी फिर परी-डोंगी 

साँस की
यात्राओं को दो
वेणुवन की ठौर 

अभी बाकी 
है अलौकिकता    
हमारे शंख में भी 
और बाकी हैं उड़ानें 
सुनो, बूढ़े पंख में भी 

इन थकी 
पिछली लयों पर भी 
करो तुम गौर         

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